टीचर की ज़ुबानी

एक ज़िन्दगी ऐसी भी

आओ सुनाऊं तुम्हे एक कहानी, टीचर की है कथा पुरानी।

आधा दूध, आधा हैं पानी, फिर भी कहे, हां में हू हिन्दुस्तानी।

दिखावे की जिंदगी जीता है ज्ञानी, फिर भी फटी बनियान की तरह हैं उसकी कहानी।

पीछे पीछे तो करता है वो भी चुगलानी, पर मैनेजमेंट के आगे बंन जाता है बिल्ली सयानी।

चलती कहां है उसकी मनमानी, पैरेंट्स के फीडबैक पर टिकी है उसकी जिंदगानी।

मध्यान्ह मे एक चाय के लिए तरसती जिभयाणी, दो बिस्किट पर टिकी लधानी।

काठियावाड़ी घोड़े से उसके जूतों की निशानी, जो बयान करती है उसके 8 से 2 की मेहनतानी।

कहते हैं वो चुगलियों की खान है, चलती फिरती गपशप की दुकान है।

अपने पर बन आए तो चलता फिरता तूफ़ान है, घर पर रहे तो कोहराम है।

आखिर वो भी इंसान है, ईर्ष्या करना उसका भी काम है।

ट्यूशन पढाना तो उसकी पहचान है, नोटों से खेलना तो उसकी भी शान हैं ।

कहते है कि हर ख्वाब पूरा कहां होता है, अध्यापक का तो नाम भी अधूरा होता है ।

ज़िंदगी घिस घिस कर एक घरौंदा बनाता है, और अपने सपनों को उसमे दफन कर जाता है।

आधी – अधूरी सी है ये कहानी, कुछ नई तो कुछ लगती है पुरानी।

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